‎संक्रांति महोत्सव पर धर्मसभा, साध्वियों ने बताया चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व

‎संक्रांति महोत्सव पर धर्मसभा, साध्वियों ने बताया चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व

‎संक्रांति महोत्सव पर धर्मसभा, साध्वियों ने बताया चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व

‎चातुर्मास में धर्म आराधना का अवसर न गंवाएं : साध्वी प्रीतिरत्ना, साध्वी प्रीतिसुधा तथा साध्वी प्रीतियशा महाराज सा

‎बीकानेर (श्रेयांस बैद): जब केसरी आचार्य विजय वल्लभसूरीजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति पद्मश्री शांतिदूत आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय नित्यानंद सुरिश्वरजी की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी रंजनश्री एवं साध्वी प्रमोदश्री महाराज सा की सुशिष्याएं साध्वी प्रीतिरत्ना,

साध्वी प्रीतिसुधा तथा साध्वी प्रीतियशा महाराज सा के सान्निध्य में शुक्रवार को रंगड़ी चौक स्थित तपागच्छीय पौषधशाला में सूर्य संक्रांति महोत्सव श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। प्रातः आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहीं।

‎धार्मिक प्रवचन में साध्वियों ने सूर्य संक्रांति के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश के साथ दक्षिणायन का प्रारंभ होता है, जिसे आत्मचिंतन, संयम और आराधना का विशेष काल माना गया है। उन्होंने कहा कि 25 जुलाई से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास जैन धर्म में साधना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय है।

वर्ष के बारह महीनों में ये चार महीने आत्मकल्याण, तप, स्वाध्याय, गुरु भक्ति और धर्म आराधना के लिए विशेष अवसर प्रदान करते हैं। यदि श्रद्धालु इन चार महीनों का सदुपयोग नहीं करते, तो वर्षभर की आध्यात्मिक साधना अधूरी रह जाती है।

इसलिए प्रत्येक श्रावक-श्राविका को गुरु आज्ञा के अनुरूप धर्म, तप, त्याग और सेवा के कार्यों में मन, वचन और कर्म से जुड़ना चाहिए।

‎आत्मानंद जैन सभा चातुर्मासिक समिति के अजय बैद ने बताया कि संक्रांति महोत्सव के अवसर पर वीर मंडल, सौम्या मंडल एवं आराधना महिला मंडल के साथ महेंद्र कोचर, पिंटू स्वामी ने गुरु भजन की भक्तिमय प्रस्तुतियां दीं।

गुरु भक्ति से ओतप्रोत भजनों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक उल्लास से भर दिया। इस अवसर पर समिति के शांतिलाल सेठिया का सुरेंद्र बधाणी, अशोक कोचर एवं सुरेश बैद ने बहुमान किया तथा नीलू सेठिया का बहुमान कुसुम बधानी , विनोद देवी, प्रभा देवी व भंसाली परिवार ने किया ।


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‎कार्यक्रम में आत्मानंद जैन सभा की चातुर्मासिक समिति के शांतिलाल सेठिया, नीलम सिपानी, सुरेंद्र बधाणी, अजय बैद, शांतिलाल हनु कोचर, संजय कोचर, राजेंद्र कोचर, कुसुम बधाणी, नीलू सेठिया, प्रभा देवी कोचर, विनोद देवी कोचर सहित समाज के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के पश्चात माणकचंद, शांतिलाल एवं अजय सेठी परिवार की ओर से सूरज भवन में साधर्मिक वात्सल्य का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में साधर्मिक शामिल हुए।

‎सूर्य संक्रांति महोत्सव पर पूज्य साध्वी प्रीतिरत्ना, साध्वी प्रीतिसुधा तथा साध्वी प्रीतियशा महाराज सा के द्वारा आज के प्रवचन :

‎जब किसी भवितव्य तीर्थंकर आत्मा का देवलोक से च्यवन होता है और वह अपनी माता की पवित्र कुक्षि में अवतरित होती है, तब माता शुभ स्वप्नों का दर्शन करती है। ये शुभ स्वप्न महापुरुष के आगमन का संकेत होते हैं।

भगवान का जन्म होते ही देवेन्द्र का सिंहासन कम्पायमान हो उठता है। इन्द्रादि देवगण पृथ्वी पर अवतरित होकर भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले जाते हैं और वहाँ उनका दिव्य जन्माभिषेक करते हैं।

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‎कालक्रम में भगवान राजवैभव, राज्यसत्ता और समस्त सांसारिक ऐश्वर्य के बीच रहते हुए भी उनसे पूर्णत: विरक्त हो जाते हैं। लोकान्तिक देव आकर भगवान से संयम धारण करने की विनती करते हैं। तब भगवान संसार का परित्याग कर संयम साम्राज्य को स्वीकार करते हैं।

‎संयम ग्रहण करने के बाद भगवान बाईस परीषहों (22 परीषह) को समभाव से सहन करते हैं। जैन धर्म का यह अटल सिद्धांत है कि जो साधक परीषहों को समता से सहन करता है, धर्म की महाशक्ति उसे अवश्य फल प्रदान करती है। भगवान ने तप, त्याग और सहनशीलता की चरम साधना की और अंततः उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई।

समस्त घातिया कर्म क्षीण हो गए। देव, मनुष्य और अन्य जीव उनके समवसरण में उपस्थित हुए। वहाँ भगवान ने समस्त जीवों के कल्याण के लिए दिव्य देशना प्रदान की।

‎भगवान की देशना में धर्म के दो प्रमुख मार्ग बताए गए—साधु धर्म और श्रावक धर्म। साधु के लिए महाव्रत, कठोर संयम, तप और उत्कृष्ट आचार-विचार का विधान किया गया, जबकि गृहस्थ श्रावकों के लिए अणुव्रत, गुणव्रत, शिक्षाव्रत तथा मर्यादित जीवन-पद्धति का मार्ग बताया गया।

‎संक्रांति महोत्सव पर धर्मसभा, साध्वियों ने बताया चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व

‎भगवान ने साधु-साध्वियों के विहार के भी नियम निर्धारित किए। वर्षा ऋतु को छोड़कर साधु-साध्वियाँ निरंतर विहार करते हुए धर्म का प्रचार-प्रसार करें तथा चातुर्मास के चार महीनों में एक ही स्थान पर निवास करें, जिससे अधिक से अधिक जीवों का कल्याण हो सके और धर्म की प्रभावना निरंतर होती रहे।

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