मोमासर सरपंच चुनाव में घमासान: 8 प्रत्याशियों के बीच कड़ा मुकाबला, कौन बनेगा गांव का मुखिया?
पुराने सरपंचों की प्रतिष्ठा दांव पर, कोई विरासत बचाने तो कोई अपना वर्चस्व कायम करने की जुगत में; रैलियों से लेकर सोशल मीडिया और कॉल सेंटर तक उम्मीदवारों ने झोंकी पूरी ताकत
मोमासर। ग्राम पंचायत मोमासर में सरपंच पद का चुनाव इस बार बेहद रोचक और दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। गांव की सत्ता की कुर्सी हासिल करने के लिए कुल 8 प्रत्याशी चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
चुनावी मुकाबले में कहीं पुराने सरपंचों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है तो कहीं राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
वहीं कुछ प्रत्याशी गांव के विकास को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाकर मतदाताओं के बीच पहुंच रहे हैं। ऐसे में अब पूरे गांव में एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर मोमासर की जनता किसे अपना नया सरपंच चुनेगी?
इस बार का चुनाव केवल सरपंच पद की दावेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव में राजनीतिक वर्चस्व, पुराने जनाधार और नए नेतृत्व की परीक्षा भी बन गया है।
आठ प्रत्याशियों के मैदान में होने से मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। हर उम्मीदवार अपनी जीत के दावे और समीकरण बनाने में जुटा है, लेकिन मतदाताओं की चुप्पी ने सभी प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ा रखी हैं।
पुराने सरपंचों की प्रतिष्ठा दांव पर, फिर से वर्चस्व बनाने की कोशिश
चुनावी मैदान में एक प्रमुख नाम जेठाराम भामू का है। जेठाराम भामू पहले भी सरपंच रह चुके हैं और इस बार फिर से गांव की सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करने तथा पुराने राजनीतिक वर्चस्व को दोबारा स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं।
पूर्व सरपंच होने के कारण उनका पुराना अनुभव और गांव में बना जनसंपर्क इस चुनाव में चर्चा का विषय है। अब देखना यह होगा कि मतदाता उनके पुराने कार्यकाल और अनुभव को कितना महत्व देते हैं।
दूसरी ओर पूर्व सरपंच रहे रामू गोदारा की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उनके पुत्र मनफूल गोदारा मैदान में हैं। मनफूल गोदारा के सामने अपने पिता की पहचान और राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती है।
पिता के पुराने राजनीतिक संपर्कों और गांव में बनी पहचान के सहारे वे मतदाताओं के बीच अपनी जगह बनाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव उनके लिए केवल सरपंच पद हासिल करने का मुकाबला नहीं, बल्कि परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की परीक्षा भी माना जा रहा है।
विकास के मुद्दे पर विद्याधर शर्मा की दावेदारी
वहीं विद्याधर शर्मा भी सरपंच पद के लिए पूरी मजबूती के साथ अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। वे गांव के विकास को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाकर मतदाताओं के बीच पहुंच रहे हैं।
गांव में विकास कार्यों, बुनियादी सुविधाओं और बेहतर व्यवस्थाओं की उम्मीदों को लेकर वे लोगों से समर्थन मांग रहे हैं। उनकी रणनीति विकास के मुद्दे को केंद्र में रखकर मतदाताओं का विश्वास हासिल करने की है।
आठ प्रत्याशी, आठ दावेदारियां और जीत के अपने-अपने समीकरण
मोमासर के इस चुनावी मुकाबले में जेठाराम भामू, मनफूल गोदारा और विद्याधर शर्मा के अलावा अन्ना राम भामू, देवा राम सारण, पूनमचंद ढबास, रामनिवास भामू और शंकरलाल मेघवाल भी सरपंच पद के लिए अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।
आठ प्रत्याशियों के चुनावी मैदान में उतरने से मुकाबले के समीकरण काफी दिलचस्प हो गए हैं। हर उम्मीदवार अपने समर्थकों और मतदाताओं को साधने में लगा है। किसी को अपने पुराने संपर्कों पर भरोसा है तो कोई परिवार और सामाजिक समीकरणों के सहारे जीत की उम्मीद लगाए बैठा है। वहीं कुछ प्रत्याशी गांव के विकास और नए नेतृत्व के नाम पर समर्थन जुटाने में लगे हैं।
वोटों के बंटवारे का डर, सभी प्रत्याशियों को सता रही चिंता
इस चुनाव में आठ उम्मीदवारों की मौजूदगी ने सभी प्रत्याशियों की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं। चुनावी मैदान में जितने अधिक उम्मीदवार होंगे, वोटों के बंटवारे की संभावना भी उतनी ही अधिक रहेगी। यही वजह है कि हर प्रत्याशी को इस बात की चिंता सता रही है कि कहीं उनके परंपरागत समर्थकों के वोट किसी दूसरे उम्मीदवार की तरफ न चले जाएं।
खास बात यह है कि किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में स्पष्ट माहौल दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में किस उम्मीदवार का वोट बैंक कितना मजबूत है और किसके समर्थक अंतिम समय में किस तरफ रुख करेंगे, इसका अनुमान लगाना फिलहाल आसान नहीं है। आठ प्रत्याशियों के बीच वोटों का गणित ही इस चुनाव का सबसे बड़ा और निर्णायक पहलू बन सकता है।
रैलियों से शक्ति प्रदर्शन, सोशल मीडिया पर भी जमकर प्रचार
इस बार मोमासर के सरपंच चुनाव में प्रचार का अंदाज भी काफी बदला हुआ नजर आ रहा है। प्रत्याशियों ने केवल घर-घर जनसंपर्क तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि शक्ति प्रदर्शन के लिए रैलियों का भी सहारा लिया। समर्थकों के साथ निकाली गई रैलियों के जरिए अपनी ताकत और जनसमर्थन दिखाने की कोशिश की गई।
वहीं सोशल मीडिया भी इस चुनावी प्रचार का बड़ा हथियार बनकर उभरा है। फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से उम्मीदवार लगातार मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं। चुनावी फोटो, वीडियो, प्रचार संदेश और समर्थकों की पोस्ट के जरिए माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
चुनाव चिह्न मिलते ही मोबाइल पर बजने लगी घंटियां, कॉल सेंटर से प्रचार
इस बार के चुनाव में प्रचार का एक नया और दिलचस्प तरीका भी देखने को मिल रहा है। जैसे ही प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न आवंटित हुए, उसके बाद ग्रामीणों के मोबाइल फोन पर चुनावी प्रचार से जुड़ी कॉल आने का सिलसिला भी शुरू हो गया। कॉल सेंटर के माध्यम से उम्मीदवारों की आवाज में रिकॉर्डेड संदेश सुनाकर मतदाताओं से वोट और समर्थन की अपील की जा रही है।
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यानी अब सरपंच चुनाव का प्रचार केवल गांव की चौपाल, घरों और गलियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मोबाइल फोन भी चुनावी प्रचार का अहम माध्यम बन गया है। प्रत्याशी हर उस तरीके को अपनाने में जुटे हैं, जिससे उनकी बात अधिक से अधिक मतदाताओं तक पहुंच सके।
ग्रामीणों की खामोशी ने बढ़ाया सस्पेंस, परिणाम तक करना होगा इंतजार
चुनाव प्रचार में प्रत्याशियों और उनके समर्थकों की सक्रियता भले ही चरम पर हो, लेकिन ग्रामीण मतदाताओं ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। गांव की चौपालों और सार्वजनिक स्थानों पर चुनावी चर्चा जरूर हो रही है, लेकिन मतदाता खुलकर किसी एक प्रत्याशी के समर्थन में सामने आने से बचते नजर आ रहे हैं।
यही खामोशी प्रत्याशियों के लिए सबसे बड़ी पहेली बनी हुई है। हर उम्मीदवार अपने पक्ष में माहौल होने का दावा कर सकता है, लेकिन वास्तविक तस्वीर मतदान के दिन ही सामने आएगी। गांव के मतदाता किसे अपना आशीर्वाद देते हैं, यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।
मोमासर में इस बार मुकाबला आठ प्रत्याशियों के बीच है। पुराने सरपंचों का अनुभव, राजनीतिक विरासत, विकास के वादे, सामाजिक समीकरण, शक्ति प्रदर्शन और आधुनिक प्रचार के तरीकों के बीच गांव की जनता का फैसला सबसे अहम होगा।
अब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या जेठाराम भामू एक बार फिर अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम कर पाएंगे? क्या मनफूल गोदारा अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने में सफल होंगे? क्या विद्याधर शर्मा विकास के मुद्दे पर मतदाताओं का विश्वास जीत पाएंगे? या फिर बाकी पांच दावेदारों में से कोई नया चेहरा बाजी मार ले जाएगा?

इन सवालों के जवाब के लिए अब मतदान और मतगणना के परिणाम का इंतजार करना होगा। फिलहाल मोमासर की सरपंची की कुर्सी किसके हिस्से आएगी, इसे लेकर गांव में सस्पेंस बरकरार है और आठों प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत के समीकरण बनाने में जुटे हैं।
मोमासर की जनता का फैसला ही तय करेगा गांव का अगला मुखिया!
मोमासर सरपंच चुनाव में घमासान: 8 प्रत्याशियों के बीच कड़ा मुकाबला, कौन बनेगा गांव का मुखिया?

