श्रीडूंगरगढ़ की सड़कों ने एक बार फिर चीखें सुनी हैं। रविवार को हुए भीषण सड़क हादसे में छह लोगों की मौत हो गई और एक मासूम गंभीर रूप से घायल हो गई। कुछ ही पलों में छह जिंदगियां खत्म हो गईं। कई सपने टूट गए। कई घरों की खुशियां हमेशा के लिए बिखर गईं। सबसे दुखद बात यह है कि इस हादसे के बाद भी श्रीडूंगरगढ़ में लोगों की जुबान पर वही पुराना सवाल है—क्या इन जिंदगियों को बचाया जा सकता था?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि श्रीडूंगरगढ़ में ट्रॉमा सेंटर की मांग कोई नई नहीं है। वर्षों से क्षेत्र के लोग यह मांग उठाते रहे हैं। जून 2025 में भी संघर्ष समिति के नेतृत्व में शहर और गांवों में आंदोलन हुए, ज्ञापन सौंपे गए और ट्रॉमा सेंटर की आवश्यकता को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। लोगों ने तब भी कहा था कि यह कोई राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि जीवन बचाने की जरूरत है। लेकिन एक साल बाद भी तस्वीर नहीं बदली। मांग वहीं है, फाइलें वहीं हैं और हादसे भी वहीं हैं।
श्रीडूंगरगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक महत्वपूर्ण कस्बा है। यहां से रोजाना हजारों वाहन गुजरते हैं। दुर्घटनाएं होना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन दुर्घटनाओं के बाद गंभीर घायलों को समय पर विशेषज्ञ उपचार न मिल पाना उससे भी बड़ा दुर्भाग्य है। हर बड़े हादसे के बाद घायलों को बीकानेर रेफर किया जाता है। कई बार सड़क और अस्पताल के बीच की दूरी ही जिंदगी और मौत के बीच की दूरी बन जाती है।
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चिकित्सा विज्ञान में दुर्घटना के बाद के पहले 60 मिनट को “गोल्डन ऑवर” कहा जाता है। डॉक्टर मानते हैं कि यदि इस दौरान घायल को विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा मिल जाए तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यही वह समय होता है जब शरीर मौत से लड़ रहा होता है और डॉक्टर जिंदगी को वापस खींचने की कोशिश करते हैं। लेकिन श्रीडूंगरगढ़ की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि यहां अक्सर घायल व्यक्ति अपना गोल्डन ऑवर सड़क पर, एम्बुलेंस में या रेफरल की प्रक्रिया में गंवा देता है।
दर्द इस बात का भी है कि सरकारें हर हादसे के बाद संवेदनाएं व्यक्त करती हैं, लेकिन संवेदनाएं कभी किसी की जान नहीं बचातीं। शोक संदेश कभी किसी बच्चे को उसका पिता वापस नहीं दिला सकते। मुआवजे की राशि कभी किसी मां की सूनी गोद नहीं भर सकती। जरूरत उस व्यवस्था की है जो हादसे के बाद मौत को रोक सके।
सवाल यह भी है कि आखिर ट्रॉमा सेंटर की जरूरत साबित करने के लिए श्रीडूंगरगढ़ को और क्या करना बाकी है? क्या राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगातार होने वाले हादसे पर्याप्त नहीं हैं? क्या बार-बार उठती जन मांग पर्याप्त नहीं है? क्या ज्ञापन, आंदोलन और चेतावनी सभाएं पर्याप्त नहीं हैं? या फिर व्यवस्था को हर बार कुछ नई मौतों का इंतजार रहता है?
विडंबना देखिए, चुनाव के समय विकास के बड़े-बड़े दावे सुनाई देते हैं। करोड़ों की योजनाओं के विज्ञापन छपते हैं। नई घोषणाओं की होड़ लग जाती है। लेकिन जब बात सीधे लोगों की जान बचाने वाली स्वास्थ्य सुविधा की आती है, तब फाइलें धीरे-धीरे चलती हैं। मानो लोगों की सांसों से ज्यादा महत्वपूर्ण कागजी प्रक्रियाएं हों।

आज छह जिंदगियां इस दुनिया से चली गई हैं। कल शायद कोई और हादसा होगा। फिर संवेदनाएं होंगी, फिर शोक होगा, फिर वही बयान आएंगे कि “घटना दुखद है”। लेकिन जब तक श्रीडूंगरगढ़ को ट्रॉमा सेंटर नहीं मिलता, तब तक हर बड़ा हादसा केवल सड़क सुरक्षा का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता का भी प्रमाण माना जाएगा।
यह संपादकीय किसी पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने के लिए है। क्योंकि सच्चाई यह है कि सड़क हादसे हमेशा पूरी तरह नहीं रोके जा सकते, लेकिन हादसे के बाद होने वाली कई मौतें जरूर रोकी जा सकती हैं। इसके लिए मजबूत आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था और ट्रॉमा सेंटर जैसी सुविधाएं अनिवार्य हैं।
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