गाजे-बाजे के साथ 3 जैन साध्वियों का भव्य नगर प्रवेश, धर्मसभा में गुरु भक्ति व चातुर्मास का दिया संदेश
बीकानेर (श्रेयांस बैद):पंजाब केसरी आचार्य विजय वल्लभसूरी जी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति पद्मश्री शांतिदूत आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय नित्यानंद सुरिश्वर की आज्ञानुवर्तिणी साध्वी श्री रंजनश्री एवं साध्वी प्रमोदश्री महाराज सा की सुशिष्याएं साध्वी तिरत्ना, साध्वी प्रीतिसुधा तथा साध्वी प्रीतियशा महाराज सा का रविवार को गाजे-बाजे और जयघोष के साथ भव्य नगर प्रवेश हुआ।
प्रवेश यात्रा गौड़ी पार्श्वनाथ मंदिर से प्रारंभ होकर गोगागेट, कोचर चौक, कोचर मंदिर, पंचायती ट्रस्ट होते हुए रांगड़ी चौक स्थित तपागच्छीय पौषधशाला पहुंची।
नगर प्रवेश यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाओं ने सिर पर श्रीफल कलश धारण कर भाग लिया। गुरुभक्ति गीतों की प्रस्तुति से वातावरण भक्तिमय बना रहा। यात्रा के दौरान पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने भावपूर्ण नृत्य किया तथा विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं ने साध्वी मंडल का पुष्पवर्षा एवं अभिनंदन के साथ स्वागत किया।
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दिल्ली, मध्यप्रदेश और गुजरात सहित विभिन्न राज्यों से पहुंचे गुरुभक्तों ने गुरु महिमा का गुणगान करते हुए तप और चातुर्मास की महत्ता का वर्णन किया।
नगर प्रवेश के बाद रांगड़ी चौक स्थित तपागच्छीय पौषधशाला में विशाल धर्मसभा आयोजित हुई। धर्मसभा में साध्वी प्रीतिरत्ना, साध्वी प्रीतिसुधा तथा साध्वी प्रीतियशा महाराज सा ने धर्म, गुरु भक्ति और आत्मकल्याण पर प्रवचन देते हुए कहा कि धार्मिक आयोजन समाज और नई पीढ़ी में संस्कार निर्माण का माध्यम हैं।
नई पीढ़ी संस्कारवान बनेगी तभी विद्यालय, महाविद्यालय, मंदिर, धर्मशालाएं और उपाश्रय जैसी धार्मिक संस्थाएं सुरक्षित एवं समृद्ध रहेंगी।
साध्वियों ने गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जैसे सुगंध के बिना पुष्प और पुष्प के बिना बगीचे का महत्व अधूरा है, उसी प्रकार गुरु के बिना जीवन भी अधूरा है। उन्होंने कहा कि जीवन में अहम से आत्म, वासना से उपासना और समस्या से तपस्या की ओर बढ़ना ही सच्ची साधना है।
चातुर्मास आत्मशुद्धि और आत्मपरिवर्तन का श्रेष्ठ अवसर है। इसका सदुपयोग करने वाले विरले होते हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को कंकड़ नहीं बल्कि शंकर बनने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने पर आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है। अध्यात्म की ओर झुकाव, मन-वचन-काया की पवित्रता तथा प्रतिदिन पूजा और देवदर्शन से जीवन में सकारात्मकता आती है।
परमात्मा का मार्ग नीति, नियम और सदाचार का मार्ग है। आत्मा को ऊर्जा प्रदान करने के लिए प्रभु के द्वार जाना आवश्यक है।
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जिनालय ऐसा स्थान है जहां आत्मशुद्धि के माध्यम से मनुष्य अपने असंख्य अपराधों का प्रायश्चित कर सकता है। साध्वियों ने अधिक से अधिक संख्या में चातुर्मास के धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने का आह्वान किया।
आत्मानंद जैन सभा चातुर्मासिक समिति के अजय बैद ने बताया कि 25 जुलाई से रांगड़ी चौक स्थित तपागच्छीय पौषधशाला में चातुर्मास के नियमित धार्मिक कार्यक्रम प्रारंभ होंगे। चार माह तक चलने वाले इस आयोजन में प्रवचन, स्वाध्याय, गुरु भक्ति, तप, व्रत, उपवास तथा जीवदया से जुड़े विविध धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
बच्चों के लिए विशेष धार्मिक एवं संस्कार शिक्षा की व्यवस्था भी रहेगी। चातुर्मास के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु जैन धर्म की परंपराओं के अनुरूप व्रत, उपवास एवं आराधना करेंगे।

नगर प्रवेश एवं धर्मसभा में आत्मानंद जैन चातुर्मासिक समिति के अध्यक्ष शांतिलाल सेठिया, अजय बैद, लीलम सिपानी, नीलम सिपानी, सुरेन्द्र बधाणी, हनु कोचर, दिलीप कोचर, शांतीलाल कोचर, संजय कोचर, राजेन्द्र कोचर, कुसुम बधानी, नीलू सेठिया , प्रभा देवी कोचर, विनोद देवी कोचर सहित समाज के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। साधर्मिक प्रसाद का आयोजन सूरज भवन में किया गया।


