भगवान महावीर के जीवन को जानें, तभी दृढ़ होगी श्रद्धा: प्रीतिसुधा म सा
बीकानेर (श्रेयांस बैद):आत्मानंद जैन सभा चातुर्मासिक समिति के तत्वावधान में पंजाब केसरी आचार्य विजय वल्लभसूरीजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति पद्मश्री शांतिदूत आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय नित्यानंद सुरिश्वरजी की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी रंजनश्री एवं साध्वी प्रमोदश्री महाराज सा की सुशिष्याएं साध्वी प्रीतिरत्ना,
साध्वी प्रीतिसुधा एवं साध्वी प्रीतियशा महाराज सा के सान्निध्य में रांगड़ी चौक स्थित तपागच्छीय पौषधशाला में चल रहे चौमासा प्रवचन के दूसरे दिन साध्वी प्रीतिसुधा महाराज सा ने भगवान महावीर के जीवन, जैन धर्म की मर्यादाओं और तप की महिमा पर विस्तार से प्रवचन दिए।
साध्वी प्रीतिसुधा महाराज सा ने मंगलाचरण के साथ प्रवचन प्रारंभ करते हुए कहा कि सभी तीर्थंकर करुणा के सागर हैं, लेकिन भगवान महावीर का जीवन अनेक विशिष्टताओं से परिपूर्ण है। उनके गर्भकल्याणक से ही शुभ और चमत्कारिक घटनाओं का आरंभ हो गया था।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर के जन्म, तप, केवलज्ञान और निर्वाण सहित संपूर्ण जीवन चरित्र का अध्ययन प्रत्येक श्रावक के लिए आवश्यक है। जब तक हम अपने आराध्य के जीवन और उनके सिद्धांतों को नहीं जानेंगे, तब तक श्रद्धा दृढ़ नहीं हो सकती।
उन्होंने बताया कि भगवान महावीर को वैशाख शुक्ल दशमी के दिन केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके पश्चात अगले दिन एकादशी को उन्होंने साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका रूपी चतुर्विध संघ की स्थापना कर जैन शासन को सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उनके उपदेश आज भी आगमों और सूत्रों के माध्यम से मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
👉 यहां क्लिक करें
साध्वीश्री ने कहा कि धर्म को केवल पढ़ने या सुनने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे अपने आहार, विहार, दिनचर्या और व्यवहार में उतारना ही वास्तविक धर्म है। धर्म के नाम पर विलासिता, असंयम और मर्यादाओं का उल्लंघन जैन संस्कृति की भावना के अनुरूप नहीं है।
बीकानेर: जिला जन अभियोग एवं सतर्कता समिति की बैठक 30 जुलाई को, अधिकारियों को दिए निर्देश
उन्होंने पारणा की शास्त्रोक्त परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज अनेक जैन परिवार पारणा को सामाजिक आयोजन का स्वरूप देने लगे हैं, जबकि यह तप की पूर्णाहुति का पवित्र संस्कार है।
पारणा में दिखावा, अनावश्यक वैभव, अत्यधिक व्यंजन, समय और मर्यादा की उपेक्षा तथा प्रतिष्ठा प्रदर्शन धर्म की भावना के विपरीत है। तप का सम्मान सादगी, श्रद्धा और विनय से होना चाहिए, न कि आडंबर से।
साध्वीश्री ने कहा कि पारणा शास्त्रों में निर्धारित समय और विधि के अनुसार होना चाहिए। तपस्वी को संयम के अनुरूप सात्विक एवं मर्यादित आहार अर्पित करना ही धर्म है। यदि स्वाद, विविध व्यंजन और आयोजन की भव्यता को प्राथमिकता दी जाएगी तो तप का मूल उद्देश्य आत्मशुद्धि और वैराग्य पीछे छूट जाएगा।
उन्होंने कहा कि परिवारों को यह स्मरण रखना चाहिए कि वे किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि तप, संयम और साधना का सम्मान कर रहे हैं। जहां अहंकार, प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन का भाव आ जाता है, वहां धर्म का प्रभाव स्वतः क्षीण हो जाता है।

आत्मानंद जैन सभा चातुर्मासिक समिति के श्रीसंघ की पूजा का लाभ गुप्त रहा। प्रवचन के पश्चात प्रभावना की गयी कार्यक्रम में राजेंद्र बैद, कैलाश कोचर, शांतिलाल हनु कोचर, सुरेंद्र बद्धाणी, अजय बैद, संजय कोचर, राजेंद्र कोचर, कुसुम बद्धाणी, नीलू सेठिया, प्रभा देवी कोचर, विनोद देवी कोचर, मंजू बैद सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने प्रवचन श्रवण का लाभ लिया।
भगवान महावीर के जीवन को जानें, तभी दृढ़ होगी श्रद्धा: प्रीतिसुधा म सा


